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Wednesday, August 4, 2021
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Suraj Pe Mangal Bhari Review: इस फिल्म की कुंडली में लिखा है आपका एंटरटेनमेंट, मनोज बाजपेयी और दिलजीत ने जमाया रंग

Suraj Pe Mangal Bhari Review: कोरोना ने बॉलीवुड की कुंडली में इस साल ऐसे फंदे डाले कि उसकी सांसें घुटने लगी. एक तो सिनेमाघर और शूटिंग बंद हुईं. फिर ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर ज्यादातर ऐसी फिल्में आईं कि दर्शक एंटरटेनमेंट के लिए तरस गए. मगर अब खत्म होने की तरफ बढ़ते साल में दीवाली पर जी5 लाया है, सूरज पे मंगल भारी. इस कॉमेडी की कुंडली में दर्शकों का एंटरटेनमेंट लिखा है. यह बॉलीवुड के लिए राहत भरी खबर है. फिल्म ओटीटी के साथ सिनेमाघरों में भी 15 तारीख को रिलीज हो रही है. तेरे बिन लादेन (2010) और परमाणुः द स्टोरी ऑफ पोखरन (2018) जैसी सफल फिल्मों के निर्देशक अभिषेक शर्मा की पिछली फिल्म जोया फैक्टर (2019) नाकाम थी. परंतु सूरज पे मंगल भारी से उनके करिअर की ग्रह-दशा भी चमकेगी.

फिल्म 1990 के दशक की बंबई में मंगल राणे (मनोज बाजपेयी) और सूरज (दिलजीत दोसांज) की कहानी है. जो अनचाहे ही एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं. कई बार यूं होता है कि जिंदगी जिनकी खुशियां छीन लेती हैं, उन्हें दूसरों की खुशियां बर्दाश्त नहीं होती. मंगल राणे की जिंदगी का प्यार छिन चुका है और नतीजा यह कि उसे अच्छा नहीं लगता कि दूसरों को उनका प्यार मिले. वह मैरिज डिटेक्टिव बन जाता है. लड़की वाले रिश्ता करने से पहले उसके पास जाकर लड़कों की खोज-खबर निकलवाते हैं और मंगल लड़कों के ऐब ढूंढ निकालता है.

मंडप में गूंजने से पहले ही शहनाइयों के स्वर बंद पड़ जाते हैं. सूरज की जिंदगी में भी मंगल का फेरा पड़ता है और उसकी शादी होते-होते रह जाती. तब सूरज कसम खाता है कि वह सूरज की बहन तुलसी राणे (फातिमा सना शेख) को ही अपने प्यार के जाल में फंसाएगा और शादी करेगा. लेकिन तुलसी के जीवन में भी एक रहस्य है. आगे की कहानी इसी घटनाक्रम का रोचक ड्रामा है. यहां पंजाबी और मराठी किरदारों का मिक्स नया रंग पैदा करता है.

नब्बे के दशक की कहानी होने की वजह से इसमें 20-20 वाली रफ्तार ढूंढने पर आपको निराशा होगी लेकिन थोड़ा धैर्य रखेंगे तो मन में फिल्म का रंग जमेगा. यह बॉलीवुड मिजाज वाली फिल्म है और विषय ही इसकी विशेषता है. सरल-सहज कहानी को मनोज बाजपेयी और दिलजीत दोसांज ने अपने परफॉरमेंस से चमकाया है.

फातिमा सना शेख, सुप्रिया पिलगांवकर, मनोज पाहवा, सीमा पाहवा, अन्नू कपूर और विजय राज ने उन्हें अच्छा सहयोग दिया है. मनोज बाजपेयी एक बार फिर इस बात को झुठलाते हैं कि वह कलात्मक या गैर-पारंपरिक फिल्मों के नायक हैं. उनके रोल में मंगल की चमक उभरती है. जबकि सूरज बने सरदार हीरो दिलजीत ने गुड न्यूज (2019) के बाद फिर अपने कॉमिक अंदाज से गुदगुदाया है. फिल्म का गीत-संगीत भी ध्यान आकर्षित करता है.

प्यार और शादी के ड्रामे अक्सर दर्शकों को बांधने में कामयाब रहते हैं. यह बात सूरज पे मंगल भारी के साथ फिर सच साबित होती है. निर्देशक अभिषेक शर्मा ने ड्रामे में संतुलन बनाए रखा. वह रोमांस को ज्यादा खींचने के चक्कर में नहीं पड़े और लड़का-लड़की के बीच रोमांटिक गाना शूट करने के मोह में नहीं उलझे.

इक्का-दुक्का हल्के-फुल्के संदर्भों को छोड़ दें तो यह कॉमेडी परिवार के साथ देखी जा सकती है. लंबे समय से पारिवारिक मनोरंजक फिल्म की भरपाई इससे होती है. यह उन कॉमेडी फिल्मों से अलग है, जिन्हें देखते हुए आपको अनिवार्य रूप से अपना दिमाग स्विचऑफ कर देना पड़ता है. फिल्म की पटकथा में हल्का विस्तार है और कहीं-कहीं कसावट कम लगती है मगर इसकी वजह नब्बे के दशक का जीवन है. जब स्मार्ट फोन नहीं, बल्कि पेजर प्यार में गिफ्ट किए जाते थे.

फिल्म में स्टेज पर महाभारत के मंचन का एक दृश्य है. इससे कुछ हास्य पैदा करने की कोशिश की गई मगर ऐसा लगता है कि वतर्मान दौर में चिंगारी से भड़क जाने वाली आग जैसे विवादों की आशंका को देखते हुए उसे जल्दबाजी में समेट लिया गया. फिल्म के संवाद चुटीले हैं. खास तौर पर जो दिलजीत के हिस्से आए हैं.

मनोज-फातिमा-सुप्रिया के संवादों में दिया गया मराठी टच कहानी में अलग उभर कर आता है. कुछ मिनटों की भूमिका में प्रोफेसर बने विजय राज असर छोड़ते हैं. फिल्म कोरोना कालीन तनाव के बीच हंसाने में सफल रहती है और इसे देख कर आप खुद को थोड़ा हल्का महसूस कर सकते हैं.

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